दस सालों तक आकाशवाणी से announcer के रूप मे जुड कर आवाज़ की दुनिया मे अपनी आवाज़ की एक पहचान बनायी जो अब मेरे वजूद का हिस्सा है.लोग कह्ते हैं और मैं जानती हूँ कि मेरी आवाज़ ही मेरी पह्चान है.तकरीबन दस साल पहले Hindustan Times द्वारा आयोजित अखिल भारतीय कहानी लेखन प्रतियोगिता मे प्रथम पुरस्कार पाना मेरे लिये उर्जा के संचार जैसा रहा, जिसने मुझे एक लेखिका के रूप मे भी पह्चान दिलाई.कविताएँ लिखना मेरे लिये ज़िन्दगी जीने जैसा है और संगीत मेरा प्यार है.पेशे से आज मै एक Anchor, Announcer और Writer हू लेकिन मन से अब भी वही भोली सी लडकी,जो अपनी बन्द मुट्ठी मे सतरंगी सपने सहेजे, अपने हिस्से का आकाश तलाश रही है, जिस पर वो अपने ये सारे सपने सजा सके.बरसों पहले मेरे एक अज़ीज़ ने मेरे नाम को कुछ इस तरह परिभाषित किया था. उसके शब्द आज भी मेरी कहानी कहते है.
प्रतिमा पूजनीय है!
इसलिये नही क्योंकि,
उसमे देवता वास करते है,
बल्कि इसलिये,
क्योंकि पत्थर से प्रतिमा बनने की प्रक्रिया में ,
लगातार हथौडी और छैनी का प्रहार झेलते हुये,
उसने सही है,
तराशे जाने की वेदना ...!
और तराशे जाने की ये वेदना ही मेरी निजी थाती है .
(सभी चित्र गूगलसर्च से साभार)
(इस ब्लाग की सभी रचनाएं लेखिका की निजी एवं मौलिक हैं.इनका अन्यत्र कहीं प्रयोग न करें.)